पत्नी करती थी न्यूड वीडियो कॉल, सच्चाई जानने पति ने बेडरूम में लगवाए कैमरे, फिर आया सच और….

(छत्तीसगढ़ प्रयाग न्यूज) :– छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी का प्रमाणपत्र संलग्न न होने के आधार पर सीसीटीवी फुटेज, सीडी या अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को फैमिली कोर्ट की कार्यवाही में खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए प्रकरण को पुनः फैमिली कोर्ट भेज दिया है और प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई कर निर्णय देने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश जस्टिस संजय के. अग्रवाल एवं जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने रायगढ़ निवासी पति की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी तलाक की अर्जी खारिज कर दी गई थी और पत्नी की दांपत्य अधिकारों की बहाली की याचिका स्वीकार कर ली गई थी।
क्या है पूरा मामला
पति-पत्नी के बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा है। पति ने फैमिली कोर्ट में पत्नी पर क्रूरता और आपत्तिजनक आचरण का आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की थी। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी अन्य पुरुषों के साथ अश्लील चौटिंग और वीडियो कॉल किया करती थी। इन आरोपों को साबित करने के लिए पति ने बेडरूम में सीसीटीवी कैमरे लगवाए थे और उनकी रिकॉर्डिंग को कॉम्पैक्ट डिस्क के रूप में कोर्ट में पेश किया था।
वहीं, पत्नी ने आरोप लगाया कि पति उस पर नजर रखने के लिए कमरे में गुप्त रूप से कैमरे लगवाता था, अतिरिक्त पैसों की मांग करता था और विरोध करने पर मारपीट करता था। पत्नी ने तमनार थाने में शिकायत दर्ज कराने के साथ ही फैमिली कोर्ट में दांपत्य अधिकारों की बहाली की याचिका भी दायर की थी।
फैमिली कोर्ट का फैसला और हाईकोर्ट की टिप्पणी
महासमुंद फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज वाली सीडी को साक्ष्य मानने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि उसके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र संलग्न नहीं है।
इस आदेश को चुनौती देते हुए पति हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 14 और 20 के तहत फैमिली कोर्ट को यह अधिकार प्राप्त है कि वह विवाद के प्रभावी निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या साक्ष्य को स्वीकार कर सकती है, भले ही वह तकनीकी रूप से साक्ष्य अधिनियम की सभी आवश्यकताओं को पूरा न करता हो। हाईकोर्ट ने मामले को पुनः फैमिली कोर्ट भेजते हुए निर्देश दिए हैं कि प्रकरण चार साल से अधिक समय से लंबित है, इसलिए इसका निपटारा प्राथमिकता के आधार पर किया जाए।
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