राजिम कुंभ कल्प मेला: परंपरा बहाल होने का इंतजार, कुंभ बिना कल्पवास अधूरा, आठ वर्षों से टूटी साधना की परंपरा

संगम तट मौन है, कल्पवास की प्रतीक्षा में राजिम कुंभ कल्प मेला

(छत्तीसगढ़ प्रयाग न्यूज) :– माघ पूर्णिमा 1 फरवरी से महाशिवरात्रि 15 फरवरी तक राजिम में कुंभ कल्प मेला भव्य रूप से आयोजित करने की तैयारियां शासन-प्रशासन ने तेज कर दी हैं। हालांकि, कुंभ कल्प मेले की प्राचीन और अनिवार्य परंपरा कल्पवास को लेकर अब भी संशय बना हुआ है। पिछले 8 वर्षों से राजिम कुंभ कल्प मेले में कल्पवास का आयोजन बंद है, जिससे साधु-संतों और श्रद्धालुओं में असंतोष और निराशा देखी जा रही है।

प्राचीन परंपरा, लेकिन वर्षों से ठप

कुंभ मेले में कल्पवास की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। वर्ष 2004-05 में अर्धकुंभ पर्व की शुरुआत के बाद जब राजिम कुंभ मेला प्रारंभ हुआ, तब मेला शुरू होने के एक माह पूर्व से ही कल्पवास आरंभ हो जाता था। इस दौरान गृहस्थी साधु-संत और श्रद्धालु ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए एक माह तक भजन-कीर्तन, वंदन और पूजा-पाठ में लीन रहते थे।

वर्ष 2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद तत्कालीन सरकार ने कुंभ मेला का नाम बदलकर माघी पुन्नी मेला कर दिया, जिससे कुंभ और कल्पवास की परंपरा लगभग समाप्त हो गई। वर्ष 2023 में भाजपा सरकार के पुनः सत्ता में आने पर कुंभ कल्प मेला तो शुरू हुआ, लेकिन कल्पवास अब तक बहाल नहीं हो सका है।

साधु-संतों की उम्मीद, शासन से अनुमति का इंतजार

इस बार कुंभ कल्प मेला को लेकर साधु-संतों और श्रद्धालुओं में उम्मीद जगी है कि शासन कल्पवास की अनुमति देगा। पंडित कन्हैया तिवारी ने बताया कि पंडित परिषद की ओर से कल्पवास को लेकर विधायक से लेकर मंत्री तक आवेदन दिए गए हैं, लेकिन अब तक कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं हुआ है।

उल्लेखनीय है कि कल्पवास की शुरुआत कुंभ मेला प्रारंभ होने से ठीक एक माह पूर्व होती है। यदि मेला 1 फरवरी से प्रारंभ है, तो कल्पवास 1 जनवरी से शुरू हो जाना चाहिए। परंपरागत रूप से कल्पवास कुलेश्वर नाथ महादेव मंदिर परिसर और लोमश ऋषि आश्रम क्षेत्र में होता रहा है।

कल्पवास कुंभ का अनिवार्य अंग – पन्नालाल वशिष्ठ

कल्पवास से जुड़े वरिष्ठ विद्वानों रूप नारायण तिवारी और डॉ. पन्नालाल वशिष्ठ ने बताया कि कल्पवास केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि विधान है। मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर प्राप्ति और मोक्ष है। इसी उद्देश्य से प्राचीन काल में वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था थी, जिसमें लोग गृहस्थ जीवन त्याग कर वन में जाकर साधना करते थे। कल्पवास उसी वानप्रस्थ परंपरा का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि देश की चारों कुंभ नगरियों में आज भी कल्पवास की परंपरा जीवंत है। प्रयागराज का माघ मेला इसका सशक्त उदाहरण है। प्राचीन काल में राजिम में भी महर्षि लोमस के सानिध्य में माघ मास में ऋषि-मुनि एक माह तक कल्पवास कर साधना करते थे। कालांतर में यह परंपरा लुप्त हो गई। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद भाजपा शासन में कुंभ कल्प और कल्पवास की पुनः शुरुआत हुई थी, लेकिन शासन परिवर्तन के साथ यह परंपरा फिर बाधित हो गई।

क्या है कल्पवास

कल्पवास एक विशेष हिंदू धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें श्रद्धालु कुंभ मेले के दौरान संगम तट पर एक निश्चित अवधि अक्सर एक माह तक सादा जीवन व्यतीत करते हैं। इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन, प्रातः-सायं स्नान, जप-तप, ध्यान और भूमि शयन किया जाता है।

कल्पवास के नियम अत्यंत कठोर होते हैं। इसमें मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य पालन, दिन में एक बार सात्विक भोजन, मांसाहार और तामसिक वस्तुओं का त्याग, भूमि पर शयन, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तीन बार स्नान, काम-क्रोध-लोभ पर नियंत्रण, सत्य आचरण, भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग, हवन-पूजन, वेद अध्ययन और जरूरतमंदों की सेवा शामिल है। कल्पवासी संगम तट पर कुटिया बनाकर निवास करते हैं और निर्धारित क्षेत्र से बाहर नहीं जाते।

परंपरा बहाल करने की मांग

विद्वानों और संत समाज का कहना है कि कल्पवास के बिना कुंभ कल्प मेला अधूरा है। यह कुंभ का अपरिहार्य अंग है और इसकी पुनः शुरुआत अत्यंत आवश्यक है। अब देखना होगा कि शासन इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक परंपरा को पुनर्जीवित करने की दिशा में क्या निर्णय लेता है।

छत्तीसगढ़ प्रयाग न्यूज से जुड़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

https://chat.whatsapp.com/Ihl8c6n3whwBoOjrVkYYRS

यह खबर भी जरुर पढ़े

विश्व में फैल रही है राजिम कुंभ कल्प की ख्याति, राजिम कुंभ कल्प पहुंचे विदेशी पर्यटक, बोले इट्स वन्डरफूल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button