तालाब की मेड़ पर 5 लाख का ‘डिजिटल सेंटर’, ग्रामीणों ने उठाए सवाल
गांव से दूर सुविधा केंद्र बनाने की जिद क्यों? सरकारी जमीन होते हुए तालाब की मेड़ ही क्यों चुनी गई?

(छत्तीसगढ़ प्रयाग न्यूज) गरियाबंद :– सरकारी योजनाओं का उद्देश्य आम लोगों तक सुविधाएं पहुंचाना होता है, लेकिन गरियाबंद जिले के ग्राम पंचायत आमदी ‘म’ में खनिज न्यास निधि से करीब पांच लाख रुपये की लागत से बन रहा अटल डिजिटल सुविधा केंद्र अब सुविधा से ज्यादा सवालों का केंद्र बन गया है। सबसे बड़ा सवाल निर्माण स्थल को लेकर उठ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव की मुख्य आबादी से दूर तालाब की मेड़ पर इस केंद्र का निर्माण कराया जा रहा है, जबकि गांव में उपयुक्त सरकारी जमीन उपलब्ध होने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि ग्रामीणों की डिजिटल जरूरतों को पूरा करने वाले केंद्र के लिए तालाब की मेड़ को ही निर्माण स्थल क्यों चुना गया?
ग्रामीणों का आरोप है कि केंद्र गांव की मुख्य आबादी से काफी दूर होने के कारण इसका सीधा लाभ लेने में बुजुर्गों, महिलाओं और जरूरतमंद ग्रामीणों को परेशानी हो सकती है। छोटी-छोटी डिजिटल सेवाओं के लिए उन्हें केंद्र तक आने-जाने में अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ेगी।
ग्रामीणों से दूर केंद्र, सुविधा किसे मिलेगी?
ग्रामीणों का सवाल है कि जब सुविधा आम लोगों को देनी है तो केंद्र गांव के बीच या ऐसी जगह क्यों नहीं बनाया गया, जहां अधिक से अधिक ग्रामीण आसानी से पहुंच सकें। ग्रामीण यह भी जानना चाहते हैं कि स्थल चयन से पहले उनकी सुविधा को लेकर कोई सर्वे कराया गया था या नहीं और क्या ग्राम पंचायत ने वैकल्पिक सरकारी जमीन तलाशने की कोशिश की थी।
भवन का निर्माण तालाब की मेड़ पर कराए जाने को लेकर इसकी सुरक्षा और तकनीकी मजबूती पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार तालाब की मेड़ की मजबूती, जलभराव की स्थिति और भविष्य में भवन की सुरक्षा को लेकर निर्माण से पहले तकनीकी परीक्षण जरूरी है।
ऐसे में सवाल है कि क्या भवन निर्माण से पहले तालाब की भूमि और मेड़ की तकनीकी जांच कराई गई? क्या निर्माण के लिए संबंधित विभागों से आवश्यक अनुमति ली गई? क्या स्थल का तकनीकी परीक्षण कराया गया? यदि ये प्रक्रियाएं पूरी की गई हैं तो संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
उपयोगिता पर सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि आमदी में सरकारी जमीनों पर कब्जे और उनके उपयोग को लेकर भी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में यदि प्रशासन सरकारी जमीनों का चिन्हांकन करे तो गांव में ही डिजिटल सुविधा केंद्र के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध हो सकता है। फिर तालाब की मेड़ को निर्माण स्थल के रूप में चुनने की जरूरत क्यों पड़ी, यह सवाल अब ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
ग्रामीण यह भी मांग कर रहे हैं कि यह स्पष्ट किया जाए कि स्थल चयन की प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं और क्या ग्राम सभा में निर्माण स्थल को लेकर चर्चा की गई थी।
गौरतलब है कि खनिज न्यास निधि का उपयोग क्षेत्र के विकास और जनसुविधाओं के लिए किया जाता है। ऐसे में इस राशि से बनने वाले भवन का अधिकतम लाभ ग्रामीणों को मिलना चाहिए। यदि केंद्र ऐसी जगह बन रहा है जहां आम लोगों की पहुंच मुश्किल है, तो सरकारी राशि खर्च करने की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों ने निर्माण कार्य की स्वीकृति, स्थल चयन, तकनीकी स्वीकृति, भूमि संबंधी दस्तावेज, निर्माण एजेंसी, स्वीकृत लागत और भुगतान की स्थिति की जांच सार्वजनिक करने की मांग की है।
प्रक्रिया की जांच की जाए
मामला केवल पांच लाख रुपये की लागत से बन रहे भवन तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी योजना की उपयोगिता और निर्माण स्थल के चयन से भी जुड़ा है। ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर यह स्पष्ट करे कि तालाब की मेड़ पर निर्माण नियमों के अनुरूप है या नहीं। साथ ही निर्माण स्थल के भूमि रिकॉर्ड, तकनीकी स्वीकृति और स्थल चयन की प्रक्रिया की जांच की जाए।
यदि निर्माण नियमों के अनुरूप है तो जिम्मेदार अधिकारी दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करें और यदि किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई है तो निर्माण पूरा होने से पहले उचित निर्णय लिया जाए। अब सवाल यही है कि सरकार जब ग्रामीणों को डिजिटल सुविधा देने के लिए पांच लाख रुपये खर्च कर रही है, तो सुविधा केंद्र ही ग्रामीणों से दूर क्यों बनाया जा रहा है और गांव में सरकारी जमीन के विकल्प तलाशने के बजाय तालाब की मेड़ को ही क्यों चुना गया?
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