नदी से रेत चोरी करने वाले आरोपी को 3 साल की जेल, 25 हजार का जुर्माना, कोर्ट ने कहा – मनुष्य पैसे को खा नहीं सकता
पर्यावरण संरक्षण पर जताई गंभीर चिंता; बोले- प्रकृति का विनाश आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए खतरा

(छत्तीसगढ़ प्रयाग न्यूज) :– नदियों से अवैध रेत उत्खनन कर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने वालों के खिलाफ न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। नदी से अवैध रूप से रेत उत्खनन और चोरी के मामले में न्यायालय ने आरोपी को तीन वर्ष के कठोर कारावास और 25 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। मामला बिलासपुर जिले के कोटा थाना क्षेत्र अंतर्गत अरपा नदी के नगाई घाट का है।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2025 में आरोपी कुंवर सिंह कंवर के खिलाफ अवैध रेत उत्खनन और चोरी के मामले में प्रकरण दर्ज किया गया था। मामले की सुनवाई के बाद न्यायालय ने आरोपी को विभिन्न कानूनी प्रावधानों के तहत दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास और 25 हजार रुपये के जुर्माने से दंडित किया।
आरोपी को भारतीय न्याय संहिता की धारा 303(2), छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियम, 2015 के नियम 71 तथा खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की धाराओं 4(1), 4(1क) और 21 के तहत दोषी पाया गया।
विशेष न्यायाधीश सिराजुद्दीन कुरैशी ने फैसला सुनाते हुए पर्यावरण संरक्षण की अनदेखी पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने प्रकृति के अंधाधुंध दोहन के दुष्परिणामों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाना केवल वर्तमान की समस्या नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी गंभीर खतरा है।
‘जब आखिरी नदी जहरीली होगी, तब समझ आएगी प्रकृति की कीमत’
सुनवाई के दौरान विशेष न्यायाधीश ने पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझाने के लिए अमेरिकी आदिम जनजाति से जुड़ी एक प्रसिद्ध कहावत का उल्लेख किया। कहावत का भावार्थ है कि जब आखिरी पेड़ काट दिया जाएगा, आखिरी नदी जहरीली हो जाएगी और आखिरी मछली पकड़ ली जाएगी, तब मनुष्य को एहसास होगा कि वह पैसे को खा नहीं सकता।
इस विचार के माध्यम से न्यायालय ने प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान के गंभीर परिणामों की ओर ध्यान आकर्षित किया। अदालत का संदेश स्पष्ट था कि आर्थिक लाभ के लिए प्रकृति को लगातार नुकसान पहुंचाना अंततः मानव जीवन के लिए ही संकट पैदा करता है।
जैव विविधता का विनाश, प्रकृति के अस्तित्व पर हमला
न्यायालय ने पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए पोप फ्रांसिस के उस विचार का भी हवाला दिया, जिसमें जैव विविधता के विनाश को ईश्वर की रचना की अखंडता पर हमला बताया गया है। इस संदर्भ के जरिए प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
अवैध उत्खनन करने वालों के लिए सख्त संदेश
अरपा नदी से अवैध रेत उत्खनन के मामले में सुनाई गई सजा को प्राकृतिक संसाधनों के अवैध दोहन के खिलाफ सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। नदियों से अनियंत्रित रेत उत्खनन नदी के प्राकृतिक स्वरूप, पर्यावरणीय संतुलन और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
न्यायालय के फैसले ने यह संदेश दिया है कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जवाबदेही भी है। यदि प्रकृति के साथ इसी तरह खिलवाड़ जारी रहा, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।
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