पितृपक्ष शुरू: पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का 16 दिवसीय पर्व, पंडित ब्रह्मदत्त शास्त्री ने बताया तर्पण-पिंडदान का महत्व

(छत्तीसगढ़ प्रयाग न्यूज) :– अनंत चतुर्दशी पर गणेश जी की विदाई के बाद शनिवार से 16 दिवसीय पितृपक्ष प्रारंभ हो गया है। यह पर्व पूर्णिमा से अमावस्या तक पितरों के पूजन, तर्पण और श्राद्ध के विशेष विधान के साथ मनाया जाता है।
ज्योतिष भूषण पंडित ब्रह्मदत्त शास्त्री ने बताया कि इस वर्ष पितृपक्ष में ज्योतिषीय दृष्टि से कुछ विशेष संयोग बन रहे हैं, जिन्हें करीब 60 वर्षों बाद बनने वाला बताया जा रहा है। इस अवधि में श्रद्धा और भक्ति के साथ पूर्वजों का स्मरण एवं धार्मिक अनुष्ठान करने से पितरों की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।
उन्होंने बताया कि पितृपक्ष में पूर्वजों की पुण्यतिथि पर पंचबली पूजा, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज का विधान है। पंचबली में गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवताओं के लिए अन्न का भाग निकाला जाता है। अन्न, वस्त्र और भोजन का दान करने के साथ दक्षिण दिशा में पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाने की भी धार्मिक मान्यता है।
पंडित शास्त्री ने कहा कि इन 16 दिनों में लोग सात्विक जीवन, ब्रह्मचर्य और शाकाहारी भोजन का पालन करते हुए अपने पूर्वजों का भावपूर्वक स्मरण करते हैं। ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष के योग होने पर इस अवधि में पूर्वजों के निमित्त विशेष पूजा-अनुष्ठान भी किया जाता है।
उन्होंने कहा कि आज हमारा अस्तित्व और कुल-वंश की प्रगति पूर्वजों के योगदान से जुड़ी है। इसलिए पितृपक्ष में पारिवारिक परंपराओं का पालन करते हुए पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
पंडित ब्रह्मदत्त शास्त्री के अनुसार माता का नवमी श्राद्ध 4 अक्टूबर रविवार को होगा, जबकि 10 अक्टूबर को सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या मनाई जाएगी। इस दिन ज्ञात-अज्ञात सभी पूर्वजों के निमित्त पिंडदान और श्राद्ध किया जाता है। इसके बाद 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र प्रारंभ होंगे।
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