पराली जलाने से पर्यावरण को गंभीर खतरा: मिट्टी की उर्वरता घटने के साथ स्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभाव, पराली जलाने के बजाय अपनाए ये बेहतर विकल्प

मिट्टी की उर्वरता घटने और स्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभाव से किसान हो रहे प्रभावित

(छत्तीसगढ़ प्रयाग न्यूज) :– गरियाबंद जिले में रबी सीजन में धान कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि यह पर्यावरण, मिट्टी की उर्वरता और मानव स्वास्थ्य तीनों के लिए गंभीर समस्या बनती जा रही है। धान की कटाई के बाद अधिकांश किसान खरीफ फसलों की तैयारी के लिए खेतों में बची पराली को आग लगा देते हैं, जिससे मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट होते हैं और वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है।

पराली जलाने से मिट्टी की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार एक टन धान की पराली जलाने से लगभग 400 किलो कार्बन, 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 2.5 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर का नुकसान होता है। इसके साथ ही मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव भी नष्ट हो जाते हैं। धुएं के कारण सांस की बीमारियाँ, आंखों में जलन और हृदय संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं। शहरों और गांवों दोनों में वायु प्रदूषण का स्तर अचानक बढ़ जाता है। पराली जलाना कानूनन अपराध है और इसके लिए जुर्माना एवं कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।

कई बेहतर विकल्प मौजूद

किसानों के लिए पराली जलाने के बजाय कई बेहतर विकल्प मौजूद हैं। पराली का उपयोग पशुओं के चारे और बिछावन के रूप में किया जा सकता है। इसमें उच्च गुणवत्ता का फाइबर और पर्याप्त प्रोटीन होता है। जो पशुओं के स्वास्थ्य और विकास के लिए लाभदायक है। पराली को खेत में मिलाकर जैविक खाद के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है।

इसके लिए रोटावेटर, हैप्पी सीडर, पैडी स्ट्रॉ रीपर और डिस्क हैरो जैसी मशीनें उपयोगी सिद्ध होती हैं। पराली को कम्पोस्टिंग, बायो-डीकंपोजर और ट्राइकोडर्मा के माध्यम से भी खाद में बदला जा सकता है। शोध बताते हैं कि पराली में नाइट्रोजन 0.5 से 1 प्रतिशत, फॉस्फोरस लगभग 0.6 प्रतिशत और पोटाश लगभग 1.5 प्रतिशत तक मौजूद होता है, साथ ही जिंक, आयरन और मैगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी पाए जाते हैं।

यह खेत की उर्वरता बढ़ाने में अत्यंत सहायक है। कृषि विभाग ने स्वच्छ खेत, स्वस्थ किसान यही हमारी पहचान संदेश देते हुए किसानों से अपील की है कि वे पराली जलाने से बचें और पर्यावरण-अनुकूल आधुनिक तकनीकों को अपनाएँ। इससे न केवल मिट्टी की सेहत में सुधार होगा बल्कि परिवार और समाज को प्रदूषण के दुष्प्रभावों से भी बचाया जा सकेगा।

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