पांच साल से तैयार आलीशान भवन, फिर भी जर्जर शेड में रह रहे बच्चे! देखरेख के अभाव में खंडहर में तब्दील हो रहा करोड़ों का भवन
10 जून 2021 को हुआ था नए भवन का उद्घाटन, अब तक नहीं हुआ आश्रम का संचालन

(छत्तीसगढ़ प्रयाग न्यूज) गरियाबंद :– एक तरफ आदिवासी बच्चों के लिए करोड़ों रुपये की लागत से सर्वसुविधायुक्त नया भवन तैयार है, जिसका उद्घाटन भी करीब पांच साल पहले हो चुका है, वहीं दूसरी ओर बच्चे आज भी करीब छह दशक पुराने जर्जर शेडनुमा भवन में रहकर पढ़ाई करने को मजबूर बताए जा रहे हैं। बारिश के दिनों में पुराने भवन के कमरों में पानी रिसने की बात सामने आ रही है।
इस बीच मैनपुर के देहारगुड़ा में बना नया भवन लंबे समय से उपयोग में नहीं आने के कारण देखरेख के अभाव में खराब होने लगा है। मामला आदिम जाति कल्याण विभाग के अधीन संचालित आदिवासी बालक आश्रम मैनपुर का है। क्षेत्र के लोगों ने अब जिला प्रशासन से मांग की है कि आश्रम को तत्काल नए भवन में स्थानांतरित किया जाए, ताकि बच्चों को सुरक्षित और बेहतर सुविधाएं मिल सकें तथा सरकारी राशि से तैयार भवन का भी उपयोग हो सके।
1966 में शुरू हुआ था आदिवासी बालक आश्रम
जानकारी के अनुसार मैनपुर नगर में आदिवासी बालक आश्रम की शुरुआत वर्ष 1966 में हुई थी। वर्तमान में आश्रम में कक्षा पहली से आठवीं तक के करीब 100 बच्चों के रहने की क्षमता बताई जा रही है। लंबे समय से आश्रम के लिए बेहतर भवन की मांग क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और लोगों द्वारा की जाती रही।
इसके बाद मैनपुर से करीब छह किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत देहारगुड़ा में 162.76 लाख रुपये की लागत से नया आश्रम भवन तैयार किया गया। सर्वसुविधायुक्त इस भवन का उद्घाटन 10 जून 2021 को तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित तत्कालीन लोक निर्माण एवं गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू, तत्कालीन शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम, पूर्व सांसद चुन्नीलाल साहू, डमरूधर पुजारी, स्मृति ठाकुर और जिला पंचायत सदस्य लोकेश्वरी नेताम की मौजूदगी में किए जाने की जानकारी दी गई है।
उद्घाटन के बाद भी पुराने भवन में ही संचालन

नए भवन के उद्घाटन को करीब पांच वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आश्रम का संचालन अब तक पुराने भवन में ही किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि जब नया भवन तैयार है और उसका उद्घाटन भी हो चुका है, तो आखिर आश्रम को वहां स्थानांतरित क्यों नहीं किया गया?
वहीं दूसरी ओर नया भवन लंबे समय से खाली रहने के कारण उसके परिसर में झाड़ियां उगने, खिड़की-दरवाजों के खराब होने और भवन के रखरखाव को लेकर भी ग्रामीणों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि समय रहते भवन का उपयोग शुरू नहीं किया गया तो सरकारी राशि से तैयार यह भवन धीरे-धीरे खराब होता चला जाएगा।
60 साल पुराने शेडनुमा भवन में बच्चों की पढ़ाई
वर्तमान में जिस भवन में आदिवासी बालक आश्रम संचालित होने की बात कही जा रही है, वह करीब 60 वर्ष पुराना शेडनुमा भवन बताया गया है। ग्रामीणों के मुताबिक बारिश के दौरान छत से पानी रिसने के कारण कमरों के भीतर पानी पहुंच जाता है। भवन के ऊपर पॉलीथिन लगाकर पानी रोकने का प्रयास किया गया है।
ऐसे वातावरण में बच्चों के रहने और पढ़ाई करने को लेकर क्षेत्र के लोग चिंतित हैं। उनका कहना है कि जब नया और बेहतर भवन उपलब्ध है, तो बच्चों को पुराने भवन में रखने की स्थिति का जल्द समाधान किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों ने कलेक्टर से की नए भवन में शिफ्ट करने की मांग
ग्राम पंचायत देहारगुड़ा के सरपंच महेश दीवान, जनपद सदस्य प्रताप सिंह मरकाम, पूर्व सरपंच डिगेश्वरी सांडे, पूर्व उपसरपंच पवन दीवान सहित लोकेश सांडे, रामप्रसाद, सोहन नागेश, बुधराम सांडे, हितराम, देवन नेताम और अन्य ग्रामीणों ने आश्रम को नए भवन में शुरू करने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि नए भवन के तैयार होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं होना चिंता का विषय है। वहीं पुराने भवन की स्थिति को देखते हुए बच्चों की सुविधा और सुरक्षा के लिहाज से नए भवन में आश्रम शुरू किया जाना जरूरी है। ग्रामीणों ने इस मामले में गरियाबंद कलेक्टर से हस्तक्षेप कर जल्द व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।
पहले एकलव्य विद्यालय का हुआ था संचालन

इस मामले में आदिम जाति कल्याण विभाग गरियाबंद के सहायक आयुक्त लोकेश्वर पटेल ने बताया कि आदिवासी बालक आश्रम का नया भवन करीब पांच साल पहले बनकर तैयार हो चुका है। उन्होंने बताया कि इस भवन में पहले एक वर्ष तक एकलव्य आवासीय विद्यालय का संचालन किया गया था। इसके बाद पिछले तीन-चार वर्षों से भवन खाली है। सहायक आयुक्त ने कहा कि जल्द ही नए भवन में आदिवासी बालक आश्रम का संचालन शुरू करवाया जाएगा।
अब देखना होगा कि पांच साल से तैयार भवन में बच्चों की शिफ्टिंग कब तक होती है और लंबे समय से खाली पड़े भवन को उपयोग में लाने के साथ उसके रखरखाव की व्यवस्था किस तरह सुनिश्चित की जाती है। एक ओर बच्चों को बेहतर आवासीय सुविधा देने की जरूरत है, तो दूसरी ओर सरकारी राशि से तैयार भवन के लंबे समय तक अनुपयोगी रहने से होने वाले नुकसान को रोकना भी जरूरी है।
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